थर्मोसिफॉन (Thermosiphon) क्या है? यहाँ जानें

थर्मोसिफॉन की प्रक्रिया क्या होती है? यह कैसे कार्य करती है? इसके क्या अनुप्रयोग हैं पूरी जानकारी इस लेख में दी गई है।

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सूर्य प्रचुर मात्रा में हमें ऊर्जा प्रदान करता है, यह प्राकृतिक ऊर्जा का एक बड़ा स्रोत है। सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा का प्रयोग अनेक प्रक्रियाओं में किया जाता है। सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा के माध्यम से बिजली को प्राप्त किया जा सकता है, ऊष्मा को प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे ही कई प्रक्रियाएं सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा की सहायता से पूरी की जाती है। इन प्रक्रियाओं के द्वारा पर्यावरण के अनुकूल ही कार्य किया जाता है। थर्मोसिफॉन (Thermosiphon) ऐसे ही एक प्रक्रिया है, जिसकी पूरी जानकारी इस लेख के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है।

थर्मोसिफॉन (Thermosiphon) क्या है? यहाँ जानें
थर्मोसिफॉन (Thermosiphon) क्या है?

थर्मोसिफॉन (Thermosiphon) क्या है?

जिस प्रक्रिया में पानी या हवा की गर्मी की आवश्यकता की गति को बनाने के लिए प्राकृतिक, उष्मागतिकी के नियमों का एवं नवीकरणीय संसाधनों का उपयोग किया जाता है, वह प्रक्रिया ही थर्मोसिफॉन (Thermosiphon) कहलाती है, इस प्रक्रिया को थर्मोसाइफ़ोनिंग भी कहा जाता है। थर्मोसिफॉन की प्रक्रिया के लिए गर्मी के किसी अन्य स्रोत की आवश्यकता होती है, इसमें सौर ऊर्जा को किसी सौर संग्रह उपकरण में बंद किया जाता है। उसके बाद पानी या हवा में चालन के माध्यम से संग्रहीत ऊर्जा को भेजा जाता है।

थर्मोसिफॉन प्रभाव क्या होता है?

जब थर्मोसिफॉन प्रक्रिया में पानी या हवा गर्म होती है, तो हीटिंग स्रोत से गतिज ऊर्जा को प्राप्त कर उत्तेजित हो जाता है। ऐसे में पानी कम घना हो कर फैलता है और ऊपर की ओर उठता है। लेकिन जब पानी या हवा को ठंडा किया जाता है, तो ऐसे में पदार्थ के अणुओं से ऊर्जा निकाली जाती है। ऐसे में पानी कम सक्रिय और अधिक घना हो जाता है।

ठंडे एवं गर्म द्रव पदार्थों के बीच के प्राकृतिक घनत्व के अंतर का प्रयोग थर्मोसिफॉन में किया जाता है। इसमें एक ऐसे सिस्टम में पदार्थों को नियंत्रित किया जाता है, जो प्राकृतिक तरल गति को उत्पन्न करती है। आज के समय में अनेक सिस्टम में इस तकनीक का प्रयोग होता है।

थर्मोसिफॉन का सिद्धांत

थर्मोसिफॉन सिस्टम के सिद्धांत1 को निम्न बिंदुओं के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है:-

  • ठंडे पानी में गर्म पानी की तुलना में अधिक विशिष्ट घनत्व होता है, जिस से भारी होने के कारण ठंड पानी नीचे डूबता है।
  • पानी के भंडारण टैंक के नीचे कलेक्टर को लगाया जाता है। जिसमें टैंक से ठंडा पानी पाइप के द्वारा कलेक्ट तक पहुंचता है। यह कलेक्टर पानी को गर्म करने का कार्य करता है, जिस से पानी ऊपर की ओर उठता है एवं कलेक्टर के ऊपरी छोर पर पानी के पाइप द्वारा टैंक तक यह पहुंचता है।
  • उपरोक्त सिस्टम में टैंक → पानी का पाइप → कलेक्टर का चक्र यह निश्चित करता है कि पानी तब तक गर्म हो जब तक कि यह एक संतुलित तापमान को प्राप्त न करे। टैंक के ऊपर से गर्म पानी का प्रयोग किया जा सकता है।
  • प्रयोग किए गए किसी भी प्रकार के पानी को ठंडे पानी में बदल कर प्राप्त किया जा सकता है। कलेक्टर के द्वारा पुनः पानी को गर्म किया जाता है।
  • उच्च सौर विकिरण होने पर उच्च तापमान में अंतर के कारण ही गर्म पानी में कम विकिरण पर पानी जितना ऊपर उठता है, यह उससे भी अधिक तेजी से ऊपर उठता है। इसलिए पानी के परिसंचरण को पूरी तरह से सौर विकिरण के स्तर के अनुकूल बना लिया जाता है।
  • थर्मोसिफॉन सिस्टम के स्टोरेज टैंक को सिस्टम के कलेक्टर से काफी ऊपर रखा जाना चाहिए, यह कार्य सुरक्षा की दृष्टि से भी आवश्यक है, यदि ऐसा न हो तो रात के समय में सिस्टम चक्र के पीछे की ओर चल सकता है, जिस से सिस्टम में जमा सारा पानी ठंडा हो जाता है।
  • यदि सिस्टम में स्टोरेज टैंक को सिस्टम से बहुत कम ऊंचाई पर स्थापित किया जाए तो ऐसे में यह ठीक से काम नहीं करता है। उच्च सौर विकिरण एवं फ्लैटरूफ वाले स्थानों में कलेक्टर टैंक को सामान्यतः छत पर ही स्थापित किया जाता है।

थर्मोसिफॉन सिस्टम से संबंधित भौतिक विज्ञान के नियम

थर्मोसिफॉन सिस्टम में उष्मागतिकी (Thermodynamics) के नियम लागू होते हैं जो इस प्रकार हैं:-

  • उष्मागतिकी के पहले नियम के अनुसार ऊर्जा को एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है, लेकिन इसे बनाया या नष्ट नहीं किया जा सकता है, ऊर्जा हमेशा ही संरक्षित रहती है। थर्मोसिफॉन सिस्टम में पानी की गति पर यह नियम लागू होता है, सूर्य से प्राप्त ऊर्जा को इसमें निर्देशित किया जाता है, और चालन एवं संवहन के माध्यम से बदला जाता है। हीटिंग की यह प्राकृतिक प्रक्रिया रहती है, इसमें बिजली या जीवाश्म ईंधन जैसे बाह्य ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता को समाप्त किया जाता है।
  • उष्मागतिकी के दूसरे नियम के अनुसार सभी प्रकार के ऊर्जा विनिमय में यदि सिस्टम में की ऊर्जा प्रवेश नहीं करती है या सिस्टम से बाहर नहीं जाती है, तो ऐसे में सिस्टम की संभावित ऊर्जा हमेशा प्रारम्भिक अवस्था की तुलना में कम होती है। सिस्टम के प्रारंभ में डाली गई शुद्ध ऊर्जा का रिटर्न हमेशा उससे कम होता है। ऐसे में ऊर्जा हमेशा ही संरक्षित रहती है। थर्मोसिफॉन सिस्टम में गर्मी के रूप में ऊर्जा खो सकती है। इसलिए ऐसे सिस्टम में R वैल्यू के साथ इन्सुलेशन जोड़ने से गर्मी का नुकसान बहुत कम हो सकता है। और इसकी दक्षता बढ़ती है।
  • प्लांक का नियम के अनुसार किसी सतह से निकलने वाले विकिरण की वैवलेंथ सतह के तापमान के समानुपाती होती है। दो वसटूँ के बीच के तापमान अंतर के परिणाम में प्राप्त होने वाली स्थानांतरित ऊर्जा को ब्लैक मटेरियल द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। जबकि हल्की वस्तुएं परावर्तित करती हैं। किसी सोलर कलेक्टर के भीतर गहरे रंग की कलेक्टर प्लेटें अवशोषण को बढ़ाने में मदद करती है, जिससे थर्मोसिफॉन सिस्टम में हवा एवं पानी को गर्म करने के लिए प्राप्त होने वाली ऊष्मा की मात्रा में वृद्धि होती है।

थर्मोसिफॉन के अनुप्रयोग जानें

घरेलू जल तापन सिस्टम के रूप में थर्मोसिफॉन बहुत कुशल रूप से कार्य करता है। इसमें पंप एवं कंट्रोलर की आवश्यकता ही नहीं होती है। थर्मोसिफॉन सिस्टम, अधिक बड़े सिस्टमों (10 m2 से अधिक कलेक्टर सतह वाले सिस्टम ) के लिए उपयुक्त नहीं होते है। थर्मोसिफॉन सिस्टम में लगे कलेक्टर को सिर्फ सीधे छत पर ही लगाया जा सकता है, ढलान वाली छतों पर ऐसे सिस्टम के टैंक नहीं स्थापित किए जा सकते हैं। ठंड मुक्त क्षेत्रों के लिए सिंगल-सर्किट थर्मोसाइफन सिस्टम उपयुक्त होते हैं। थर्मोसिफॉन के अनुप्रयोग इस प्रकार हैं:-

सक्रिय जल तापन (Active water heating)

इन्हें पंप सिस्टम या स्प्लीट सिस्टम के नाम से जाना जाता है। ये थर्मोसाइफ़ोनिंग प्रभाव के आधार पर ही कार्य करते हैं, इनमें सिस्टम को चलाने मे सौर ऊर्जा के अतिरिक्त किसी अन्य ऊर्जा स्रोत का प्रयोग किया जाता है। इस सिस्टम में सोलर कलेक्टर को छत पर स्थापित किया जाता है। इसमें कलेक्टर टैंक को जमीन पर या नीचे कहीं और लगाया जाता है। ऐसे सिस्टम में पानी पंप करने के लिए ऊर्जा के कुछ बाह्य रूप की जरूरत होती है, इस बाह्य ऊर्जा का प्रयोग कर के ही सक्रिय जल तापन सिस्टम निष्क्रिय सिस्टम की तुलना में कम कीमत के होते हैं, इसमें प्रयोग होने वाली सामग्री इस प्रकार रहती है:-

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  • सोलर कलेक्टर
  • सौर ऊर्जा
  • इलेक्ट्रिक पंप
  • विद्युत ऊर्जा
  • अतिरिक्त पाइपिंग
  • कलेक्टर टैंक
  • पानी
  • इंसुलेशन

सक्रिय जल तापन (Active water heating) के लाभ:-

  • सक्रिय जल तापन प्रभावी लागत के साथ उपलब्ध रहता है, इसका प्रयोग करने पर पैसे की बचत की जा सकती है।
  • इसे इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि यह सही से लगाया जा सकता है।
  • सक्रिय जल तापन सिस्टम पर्यावरण के अनुकूल रह कर कार्य करता है, इसके माध्यम से ग्रीनहाउस गैसों में कमी आ सकती है। यह निष्क्रिय जल तापन सिस्टम की तुलना में कम प्रदूषण फैलाने का कार्य करता है।

सक्रिय जल तापन (Active water heating) के दोष:-

  • यह सिस्टम, निष्क्रिय जल तापन सिस्टम की तुलना में अधिक ऊर्जा का प्रयोग करता है। एवं इसे अधिक रखरखाव की आवश्यकता होती है।
  • बिजली के माध्यम से एक्टिव वाटर हीटिंग करने पर कुछ प्रदूषण उत्पन्न होता है।
  • इसे उपयुक्त मात्रा में सूर्य के प्रकाश वाले स्थान में स्थापित किया जाता है।
  • एक्टिव वाटर हीटिंग सिस्टम में लगे सोलर कलेक्टर से नीचे कलेक्टर टैंक में ऊष्मा भेजने के दौरान ऊष्मा हानि होती है।

निष्क्रिय जल तापन (Passive water heating)-

इस सिस्टम का प्रयोग बिजली के उपयोग के बिना पानी गर्म करने एवं स्थानांतरित करने में प्रयोग किया जाता है। इस सिस्टम में होने वाली प्रक्रिया में सौर ऊर्जा, गुरुत्वाकर्षण एवं उपलब्ध जल स्रोत जैसी प्राकृतिक घटनाओं के उपयोग द्वारा कार्य किया जाता है। पैसिव वाटर हीटिंग सिस्टम में सोलर कलेक्टर, वाटर टैंक एवं पाइपिंग का प्रयोग किया जाता है। वैश्विक स्तर पर आज के समय में दो प्रकार की निष्क्रिय जल तापन प्रणालियाँ उपलब्ध हैं:- गुरुत्वाकर्षण-फीड प्रणाली एवं क्लोज-कपल्ड प्रणाली।

  • निकट-युग्मित प्रणाली (Close-coupled system)– यह सिस्टम पैसिव थर्मोसाइफ़ोनिंग के सिद्धांत के अनुसार ही कार्य करता है। इसमें प्रयोग होने वाले भंडारण टैंक को सौर कलेक्टर के ऊपर रखा जाता है। ऐसे सिस्टम में इसके अतिरिक्त पाइपलाइन, इन्सुलेशन आदि का प्रयोग मजबूत छत में किया जाता है। ऐसे सिस्टम में लाभ एवं हानियाँ निम्न लिखित हैं:-
    • इसके लाभ में ये प्रभावी लागत के साथ उपलब्ध रहते हैं, इनका प्रयोग करने से किसी प्रकार का कोई प्रदूषण उत्पन्न नहीं होता है। इनके प्रयोग से ऊर्जा बढ़त को बिना किसी बिजली आवश्यकता के किया जा सकता है। इन्हें कम स्थान में भी स्थापित किया जा सकता है।
    • इनके नुकसान में ये ठंडे मौसम वाले क्षेत्र के लिए उपयुक्त नहीं हैं, इन्हें स्थापित करने के लिए मजबूत समर्थन वाले स्ट्रक्चर की आवश्यकता होती है, उपयुक्त धूप वाले स्थान में ही स्थापित किया जा सकता है। बाह्य पर्यावरणीय स्थितियों के संपर्क में आने पर इसमें लगे टैंक की कार्य क्षमता कम हो जाती है।
  • गुरुत्वाकर्षण-फीड प्रणाली (Gravity-feed system)– यह सिस्टम भी क्लोज-कपल्ड सिस्टम के समान ही थर्मोसाइफ़ोनिंग के सिद्धांतों के अनुसार प्रयोग किया जाता है। लेकिन ऐसे सिस्टम में टैंक को अलग-अलग कर के लगाया जाता है। जिन्हें छत पर स्थापित किया जाता है, जिसे सोलर कलेक्टर के ऊपर लगाया जाता है। ऐसे सिस्टम में गर्म पानी को वितरित करने के लिए अधिक पाइपिंग की आवश्यकता होती है, ऐसे सिस्टम को मजबूत छत पर स्थापित किया जाता है। इसमें इन्सुलेशन की आवश्यकता भी होती है। ऐसे सिस्टम के लाभ एवं दोष इस प्रकार रहते हैं:-
    • Gravity-feed system को प्रभावी लागत के सिस्टम भी कहा जाता है, ऐसे सिस्टम पर्यावरण के अनुकूल पूर्ण रूप से कार्य करते हैं, ऐसे सिस्टम में ऊर्जा बचत होती है, क्योंकि इनमें बिजली की आवश्यकता नहीं पड़ती है। ऐसे सिस्टम को घर के अंदर भी स्थापित किया जा सकता है।
    • Gravity-feed system के दोष में ये ठंडे स्थान के लिए उपयुक्त नहीं रहते हैं। इन्हे ऐसे स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है जहां उपयुक्त मात्रा में बिजली उपलब्ध रहती है, ऐसे सिस्टम में पाइपलाइन एवं पाइपिंग को स्थापित करने में अतिरिक्त खर्चा होता है।

निष्क्रिय वायु विनिमय (Passive air exchange)

निष्क्रिय वायु विनिमय में थर्मोसाइफन हीट एक्सचेंज की प्रक्रिया होती है, यह संवहन के सिद्धांत पर कार्य करता है। ऐसे सिस्टम में पंप का प्रयोग किया बिना पानी या हवा को एक ऊर्ध्वाधर बंध लूप वाले सर्किट में भेज दिया जाता है, इसमें अंदर की ओर ठंडी हवा एक वेंट के द्वारा पहुँचती है, सोलर कलेक्टर का प्रयोग भी इस सिस्टम में किया जाता है।

जिसके अंदर की हवा को सूर्य के किरणों के द्वारा गर्म किया जाता है, गर्म हवा कम सघन होने के कारण ऊपर उठी रहती है, जबकि ठंडी हवा अधिक अगहन होने के कारण गहराई में रहती है, गर्म हवा सोलर कलेक्टर के टॉप में एक वेंट के माध्यम से बाहर निकलती है। इसमें प्रयोग होने वाले उपकरण:-

  • सौर अवशोषण प्लेट (Solar absorption plate)
  • सोलर संग्राहक (Solar collector)
  • अलग-अलग आकार के फ्रेम
  • Glaze
  • Vents

निष्क्रिय वायु विनिमय के लाभ एवं दोष:

  • Passive air exchange के लाभ-
    • इनकी कीमत कम होती है।
    • इनका प्रयोग कर के प्रदूषण को कम किया जा सकता है। ये पर्यावरण के अनुकूल कार्य करते हैं।
    • Passive air exchange ऊर्जा की बचत करने के लिए जाने जाते हैं।
    • इनका प्रयोग ठंड करने के लिए किया जा सकता है।
  • Passive air exchange के दोष-
    • Passive air exchange में बहुत अधिक रखरखाव की आवश्यकता होती है।
    • इन्हें रात में मैनुअल रूप से बंद करना आवश्यक होता है।
    • भौगोलिक परिस्थियों से ये प्रभावित हो सकते हैं, एवं इनकी प्रभावशीलित बदल सकती है।

निष्कर्ष

थर्मोसिफॉन या थर्मोसाइफ़ोनिंग की प्रक्रिया द्वारा पानी या हवा को गर्म करने का कार्य किया जाता है। इस लेख में बताए गए थर्मोसिफॉन के प्रकारों की पूरी जानकारी आप प्राप्त कर सकते हैं, एवं इनका प्रयोग कर सकते हैं। पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए ऐसे सिस्टम का प्रयोग करना आवश्यक है, इनके प्रयोग से ही कार्बन फुटप्रिन्ट को कम किया जा सकता है, एवं हरित भविष्य की कल्पना को साकार किया जा सकता है। ऐसे सिस्टम में आप सौर ऊर्जा से चलने वाले उपकरणों का प्रयोग कर सकते हैं।

  1. थर्मोसाइफन सिस्टम का सिद्धांत यह है कि ठंडे पानी में गर्म पानी की तुलना में अधिक विशिष्ट गुरुत्व (घनत्व) होता है। ↩︎

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